कलवरी की ओर बढ़िए! — सुनना और समझना
ऑडियो के बारे में: इस संदेश की ऑडियो रिकॉर्डिंग कोरियाई भाषा में है। नीचे की सामग्री हिन्दी में है, पर प्ले दबाने पर आपको कोरियाई भाषा सुनाई देगी।
1. भविष्यवाणी किया गया दुःख और गतसमनी का कटोरा
संदेश यशायाह 53:4-6 को यीशु के क्रूस की ओर पहले से संकेत करने वाला भाग बताकर आरम्भ होता है। यशायाह में दुःख सहने वाला व्यक्ति हमारे रोग, दुःख, अपराध और पाप उठाता है; संदेश इसे यीशु के क्रूस से जोड़ता है। इसे संदेश द्वारा प्रस्तुत धर्मवैज्ञानिक व्याख्या के रूप में दर्ज किया गया है।
इसके बाद संदेश मत्ती 26:38-39 और लूका 22:42-44 के अनुसार गतसमनी में यीशु की प्रार्थना समझाता है। वचन सुनाने वाले कहते हैं कि यीशु ने सामने का दुःख नहीं छिपाया, पर अपने आपको पिता की इच्छा में सौंप दिया।
वचन सुनाने वाले कटोरे को मानवता के पाप और दुःख तथा पाप के न्याय को उठाने के रूप में समझाते हैं। वे एक प्रिय व्यक्ति की पीड़ा साथ लेने की कठिनाई की तुलना यीशु द्वारा सबका भार उठाने से करते हैं। प्रतिलेख में रक्तमिश्रित पसीने की चिकित्सीय व्याख्या भी है, लेकिन ये नोट्स उसे स्वतंत्र रूप से प्रमाणित चिकित्सीय तथ्य नहीं मानते।
2. यीशु ने हमारे घाव और लज्जा को उठा लिया
वचन सुनाने वाले कोड़े और क्रूस की शारीरिक पीड़ा बताते हुए उसे यशायाह 53:5 से जोड़ते हैं। मुख्य बात यह है कि यीशु के घाव हमारी बहाली से जुड़े हैं और हमें मुफ़्त मिलने वाला उद्धार उनके आत्मसमर्पण पर टिका है। ये नोट्स प्रतिलेख में दिए दण्ड-विधि, दूरी, मृत्यु-दर या अवधि के आँकड़ों को स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य नहीं बताते।
संदेश यूहन्ना 19:23-24 में सैनिकों द्वारा यीशु के वस्त्र बाँटने को लज्जा उठाने के विषय से जोड़ता है। उत्पत्ति 3 को स्मरण करके वह कहता है कि यीशु ने स्वयं लज्जा सहकर हमारे अपराध और लज्जा को ढका। यह संदेश द्वारा प्रस्तुत प्रतीकात्मक सम्बन्ध है।
1 पतरस 2:24 के अनुसार वचन सुनाने वाले यीशु के दुःख को क्षमा, नया जीवन, बहाली और धन्यवाद से जोड़ते हैं। वे पीड़ा का सनसनीखेज वर्णन करने के बजाय उस बलिदान से जीवन पाने वालों को याद रखने के लिए कहते हैं।3. यीशु ने हमारे पाप को उठाया और त्यागे जाने का दुःख सहा
2 कुरिन्थियों 5:21 की पृष्ठभूमि में संदेश बताता है कि पाप से अनजान यीशु ने हमारे स्थान पर पाप उठाया। प्रतिलेख यहाँ बहुत तीखा रूपक इस्तेमाल करता है। ये नोट्स प्रतिस्थापन के बाइबिलीय अर्थ की सीमा में रहते हैं और यह नहीं कहते कि यीशु पुत्र नहीं रहे।
फिर वचन सुनाने वाले मत्ती 27:46 की पुकार को यीशु का सबसे गहरा दुःख बताते हैं। संदेश कहता है कि अनन्तकाल से पिता के साथ प्रेम और संगति रखने वाले यीशु ने क्रूस पर त्यागे जाने का दुःख सहा। यह वचन सुनाने वाले की प्रायश्चित सम्बन्धी धर्मवैज्ञानिक व्याख्या है, त्रिएक परमेश्वर के सम्बन्धों की इन नोट्स द्वारा नई परिभाषा नहीं।
4. कलवरी ने मेल-मिलाप और परमेश्वर की सन्तान होने का मार्ग खोला
2 कुरिन्थियों 5:19-20 के अनुसार संदेश कहता है कि परमेश्वर मसीह में संसार का अपने साथ मेल करा रहे थे और लोगों को लौटने के लिए हाथ बढ़ा रहे थे। क्रूस को पाप की अनदेखी नहीं, बल्कि पुत्र को देकर पापियों के लिए लौटने का मार्ग खोलना बताया गया है।
वचन सुनाने वाले यूहन्ना 17:21-24 का उल्लेख करके उद्धार का उद्देश्य परमेश्वर के साथ संगति बताते हैं। क्षमा पाए लोग परमेश्वर की सन्तान होते हैं और उनकी महिमा देखने के लिए उनके प्रेम में बुलाए जाते हैं। इसे संदेश द्वारा प्रस्तुत धर्मवैज्ञानिक आशा के रूप में दर्ज किया गया है।
5. विश्वास से निमंत्रण का उत्तर दीजिए
यीशु की धार्मिकता हमें मिलने और परमेश्वर की सन्तान के रूप में नया जीवन पाने की बात समझाने के बाद संदेश सुनने वाले को पश्चाताप करने और विश्वास करने को बुलाता है। रोमियों 10:13 के आधार पर वह घमण्ड और पाप मानकर उद्धार के लिए यीशु का नाम पुकारने को कहता है।
प्रतिलेख सुसमाचार को अस्वीकार करने की चेतावनी में अपमानजनक भाषा तथा अचानक दुर्घटना, बीमारी और मृत्यु के उदाहरण देता है। ये नोट्स भय या तिरस्कार से निर्णय नहीं करवाते। वे संदेश की मुख्य विनती को क्रूस के प्रेम को देखकर सच्चे पश्चाताप और विश्वास से उत्तर देने के बुलावे के रूप में रखते हैं।
वचन सुनाने वाले कहते हैं कि परमेश्वर हर व्यक्ति को उत्तर देने की स्वतंत्रता देते हैं। वचन सुनकर हृदय में ग्रहण हो तो वे सुनने वाले को नम्र होकर यीशु से उद्धार माँगने को कहते हैं। ये नोट्स उस बुलावे को पाठक की दशा पर निर्णय नहीं बनाते, बल्कि ऐसा व्यक्तिगत विश्वास का उत्तर रहने देते हैं जिसे कोई थोप नहीं सकता।