हम मसीह में एक देह बने हैं — सुनना और समझना
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1. कलीसिया मसीह का अनुसरण करने वाले जीवन की महत्वपूर्ण संगति है
व्याख्यान रोमियों 12:5 पढ़कर और यह पूछकर शुरू होता है कि विश्वास का जीवन अच्छी तरह जीना चाहने वाले को क्या सुझाव दिया जाए। वक्ता पहले स्पष्ट करते हैं कि परमेश्वर केंद्र हैं, फिर समझाते हैं कि मसीह की देह कलीसिया, जो लोगों को परमेश्वर को जानने और उन पर विश्वास करने में सहायता देती है, विश्वास के जीवन में महत्वपूर्ण है।
वक्ता अच्छी कलीसिया पाने के लिए प्रार्थना करने और संगति स्वस्थ हो तो प्रेम तथा उत्तरदायित्व के साथ गहराई से भाग लेने को कहते हैं। व्याख्यान का तर्क है कि कलीसिया में वचन सुनना, एक-दूसरे के लिए प्रार्थना करना और देखभाल पाना संकट से गुजरते व्यक्तियों और परिवारों को शक्ति दे सकता है। ये नोट्स यह दावा नहीं करते कि कलीसिया में भाग लेना परिवार के उद्धार, बच्चों की सफलता, स्वास्थ्य या भौतिक सुरक्षा की अपने-आप गारंटी देता है।
संगति चुनने और उसमें भाग लेने का अनुभव
वक्ता स्मरण करते हैं कि युवावस्था में एक कलीसिया से परिचय कराया गया था। पहले बाहरी वातावरण आकर्षक नहीं लगा, लेकिन प्रार्थना में शांति मिली और उस संगति की शिक्षा सेवकाई में लंबे समय तक सेवा की। दूरी के कारण परिश्रम था, फिर भी बच्चों को सुसमाचार सुनाना, शिक्षकों के साथ प्रार्थना करना और परिवर्तन देखना आनन्द का कारण बना।
व्याख्यान में वक्ता की पिछली सेवकाई, परिवार और वर्तमान संगति के कई विवरण आते हैं। ये नोट्स किसी खास कलीसिया, स्थान या व्यक्ति की पहचान करा सकने वाली जानकारी और परिवार की निजी बातों को दोहराते नहीं हैं। वे केवल यह मुख्य बात रखते हैं कि स्वस्थ संगति में विश्वास और सेवा ने वक्ता के अपने विश्वास और सेवकाई को आकार दिया।
2. मसीह का जीवन देह में प्रवाहित होता है
वक्ता कलीसिया में अनुभव किए आनन्द के केंद्र को जीवन कहते हैं: व्यक्ति सुसमाचार सुनकर मसीह की ओर लौटता, प्रार्थना और आराधना के लिए खुलता, और वह परिवर्तन संगति में दूसरों तक पहुँचता है। व्याख्यान बल देता है कि यह जीवन मनुष्य के उत्साह या संगठन के आकार से नहीं, बल्कि यीशु मसीह से आता है।
फिर यूहन्ना 1:4 के द्वारा कहा जाता है कि मसीह का जीवन मनुष्यों का प्रकाश है। वक्ता बताते हैं कि जब सुसमाचार किसी व्यक्ति में प्रवेश करता और पवित्र आत्मा उसे जीवित करते हैं, तब उसके स्वभाव और जीवन में आशा का प्रकाश दिखाई देता है। व्याख्यान का दावा है कि मसीह की देह कलीसिया जीवन को अपने पास बंद रखने वाला संगठन नहीं, बल्कि सुसमाचार सुनाकर और प्रेम से सेवा करके जीवन को बहने देने वाली संगति है।
संकट में एक-दूसरे को जीवन देने वाली देखभाल
व्याख्यान कहता है कि वचन और प्रार्थना, पासबानी देखभाल तथा साथी अंगों का प्रेम जीवन के संकट से गुजरते व्यक्ति को शक्ति दे सकता है। कई परिवारों और सदस्यों की बीमारी, हानि और मन-परिवर्तन के उदाहरण दिए गए हैं, पर ये नोट्स स्वास्थ्य सूचना और पारिवारिक संबंध, आयु, काम तथा स्थान के विवरण हटाते हैं। वे व्यक्तिगत अनुभव को इस प्रमाण के रूप में भी नहीं लेते कि सभी को समान परिणाम की गारंटी है।
वक्ता उस व्यक्ति की बात बताते हैं जो सुसमाचार सीखते समय सहकर्मी के साथ वचन बाँटता है, और वह सहकर्मी स्वयं कलीसिया खोजकर विश्वास में रुचि दिखाता है। मृत्यु के निकट परिवार के सदस्य को सुसमाचार सुनाने वाले एक व्यक्ति की दूसरी कहानी से वक्ता समझाते हैं कि कलीसिया का जीवन लोगों को केवल अपने लिए नहीं, बल्कि परिवार और पड़ोसियों को भी सुसमाचार सुनाने को प्रेरित करता है। ये नोट्स पहचान कराने वाले विवरण या अंतिम समय का दृश्य नहीं दोहराते।
3. मसीह कलीसिया के सिर हैं
व्याख्यान अच्छी कलीसिया पाने वालों को उस संगति से गहराई से जुड़ने को कहता है, ताकि वे उसके वचन और प्रेम, प्रार्थना और सेवा में सच में भाग लें। साथ ही पवित्रशास्त्र से पुष्टि की जाती है कि कलीसिया का स्रोत कोई मनुष्य या संगठन नहीं, स्वयं मसीह हैं।
वक्ता इफिसियों 1:23 और कुलुस्सियों 1:18 को जोड़कर समझाते हैं कि मसीह कलीसिया के सिर और कलीसिया उनकी देह है। जीवन के स्रोत मसीह से जुड़े होने के कारण देह में जीवन बहता है; विश्वासी सिर मसीह से दिशा पाकर एक-दूसरे से जुड़े अंग बनते हैं।
परमेश्वर के राज्य की ओर देह की बुलाहट
व्याख्यान कहता है कि संसार की उपलब्धियाँ मृत्यु के सामने समाप्त होती हैं, लेकिन मसीह से जुड़ी कलीसिया परमेश्वर के अनन्त राज्य की ओर देखती है। पवित्र आत्मा हर अंग को परमेश्वर के राज्य की सेवा करने के सपने और वरदान देते और सुसमाचार सुनाने तथा लोगों को जीवन देने में भाग लेने योग्य बनाते हैं।
वक्ता परिवार का एक अनुभव बताते हैं जिसमें संकट के समय एक युवा ने संगति की प्रार्थना और देखभाल से आशा पाई, और आगे बढ़कर समान कठिनाइयों वाले दूसरे युवाओं की सहायता तथा मिशन में भाग लिया। ये नोट्स स्वास्थ्य स्थिति, पारिवारिक संबंध, भविष्यवाणी की भाषा या मिशन स्थान जैसे पहचान कराने वाले विवरण नहीं दोहराते। अनुभव केवल वक्ता की उस गवाही के रूप में दर्ज है कि देह के अनेक अंग मिलकर देखभाल करें तो व्यक्ति फिर से संगति की सेवा के स्थान तक बढ़ सकता है।
व्याख्यान में सपने और किसी नाम के मेल, राजनीतिक स्थिति तथा विशेष क्षेत्र में मिशन के दावे भी हैं। ये नोट्स स्वतंत्र रूप से जाँचने में कठिन और व्यक्ति या संगठन की पहचान करा सकने वाली बातों को तथ्य के रूप में स्थापित नहीं करते। वे केवल यह सामान्य बात रखते हैं कि कलीसिया का मिशन सुसमाचार सुनाने वालों को भेजना और मिलकर समर्थन देना है।
4. हम एक देह की एकता में मिलकर बढ़ते हैं
वक्ता आशीषित विश्वास का जीवन चाहने वालों को फिर से मसीह की देह कलीसिया से जुड़ने और उस संगति को सौंपे सुसमाचार के मिशन में भाग लेने को कहते हैं। वे मानते हैं कि अलग-अलग बाइबल अध्ययन और चंगाई या मिशन प्रशिक्षण संगठन सहायक हो सकते हैं, फिर भी बाहरी प्रशिक्षण उस वास्तविक कलीसिया में निभाए जाने वाले संबंधों और उत्तरदायित्व का स्थान नहीं ले सकता जिससे व्यक्ति जुड़ा है।
व्याख्यान में एक दिशा का अर्थ उस वचन और दर्शन में समान दिशा में चलना है जिसे संगति मिलकर पाती है। ये नोट्स इसका अर्थ किसी अगुवे या संगठन के प्रति बिना जाँच की अधीनता तक नहीं बढ़ाते। मसीह को सिर मानना और सुसमाचार तथा वचन, प्रेम तथा आपसी उत्तरदायित्व को बनाए रखना एकता की सीमाएँ हैं; हानिकारक स्थिति में सुरक्षित सीमाएँ छोड़ने की माँग के लिए एकता का उपयोग नहीं किया जा सकता।
साथ सीखने और सेवा करने से बढ़ती संगति
वक्ता बताते हैं कि सुसमाचार और त्रिएक परमेश्वर की शिक्षा साथ पाने पर सदस्यों ने अपने विश्वास को जाँचा और प्रार्थना तथा मिशन में अधिक सक्रिय भाग लिया। वे बच्चों, युवाओं और वयस्कों के मिलकर सुसमाचार सुनाने और दूसरे क्षेत्रों की कलीसियाओं के साथ संगति से सेवकाई का क्षेत्र बढ़ने के अनुभव भी बाँटते हैं।
व्याख्यान बताता है कि वर्षों तक कलीसिया जाना देह के संबंधों और उत्तरदायित्व में भाग लेने के समान नहीं है। वह कहता है कि जुड़े हुए लोग संगति की भलाई अधिक पा सकते हैं, लेकिन ये नोट्स भागीदारी के आधार पर किसी के विश्वास या मूल्य को क्रम नहीं देते। देह की एकता अलग परिस्थितियों वाले अंगों पर दबाव डालने का साधन नहीं, बल्कि प्रेम से बुलाने और मिलकर बढ़ने में सहायता देने वाला संबंध होना चाहिए।
1 कुरिन्थियों 15:58 का उल्लेख करके वक्ता उत्साह देते हैं कि प्रभु में परिश्रम व्यर्थ नहीं है। यह प्रतिज्ञा कठिनाई न आने या बच्चों और वंशजों को अपने-आप विशेष सफलता मिलने की गारंटी नहीं, बल्कि यह आशा है कि प्रेम से दिया गया परिश्रम परमेश्वर जानते हैं।5. हम अपने वरदानों के अनुसार एक-दूसरे की सेवा करते हैं
व्याख्यान फिर रोमियों 12:6-8 पर लौटकर समझाता है कि एक देह के हर अंग के वरदान और भूमिकाएँ अलग हैं। भविष्यवाणी के समान उत्साह देना, व्यावहारिक सेवा, शिक्षा, प्रोत्साहन, दान, अगुवाई और दया के उदाहरण देकर हर व्यक्ति को अपना वरदान विश्वासयोग्यता से उपयोग करने को कहा जाता है।
वक्ता बताते हैं कि उत्साह का शब्द निराश व्यक्ति को आशा दे सकता है, सेवा का वरदान रखने वाला समय, योग्यता और सामग्री बाँट सकता है, और शिक्षक वचन समझाकर दूसरे अंगों को लाभ दे सकता है। सांत्वना और जरूरतमंद की सहायता जैसी कम दिखाई देने वाली भूमिकाएँ भी देह के जीवन के प्रवाह के महत्वपूर्ण मार्ग हैं। व्याख्यान के विशेष सेवकाई और व्यक्ति के नाम इन नोट्स में पहचान रहित किए गए हैं।
सेवा द्वारा मिलकर स्वस्थ होती देह
व्याख्यान देह का रूपक उपयोग करके कहता है कि केवल कृपा पाने और उसे आगे न बाँटने पर विश्वास निष्क्रिय होकर कठोर हो सकता है। इसके विपरीत स्वागत, देखभाल या शिक्षा जैसी व्यावहारिक भूमिकाओं में सेवा करने पर पाई हुई कृपा दूसरों तक जाती और सेवा करने वाला भी प्रार्थना तथा सीखने से बढ़ता है। यह रूपक सभी से समान मात्रा में काम की माँग नहीं, बल्कि अपनी परिस्थिति और वरदान के अनुसार देह में भाग लेने का आग्रह है।
अंत में 1 कुरिन्थियों 3:7-8 का उल्लेख करके वक्ता कहते हैं कि लोग रोपते और सींचते हैं, लेकिन बढ़ाने वाले परमेश्वर हैं। अंग स्वयं को जीवन का स्रोत न मानकर सौंपा काम विश्वासयोग्यता से करें और परिणाम तथा महिमा परमेश्वर को दें। व्याख्यान सेवा के प्रतिफल से उत्साह देता है, पर ये नोट्स इसे भौतिक इनाम या वंशजों की सफलता की गारंटी नहीं बनाते।
व्याख्यान इस प्रार्थना से समाप्त होता है कि सुनने वाले कलीसिया से प्रेम करें, उससे जुड़ें और पाए हुए वरदानों से सेवा करें। अंत के गीत के बोल फिर प्रकाशित नहीं किए गए हैं।