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जब एक आत्मा उद्धार पाती है — सुनना और समझना

ऑडियो के बारे में: इस संदेश की ऑडियो रिकॉर्डिंग कोरियाई भाषा में है। नीचे की सामग्री हिन्दी में है, पर प्ले दबाने पर आपको कोरियाई भाषा सुनाई देगी।

1. एक आत्मा का उद्धार पाना चमत्कारों में चमत्कार है

वचन सुनाने वाले विश्वास-जीवन के केन्द्र को आत्मा का उद्धार और उसकी वृद्धि बताते हैं और कहते हैं कि इस बार वे उस प्रक्रिया पर विचार करेंगे जिसमें एक आत्मा उद्धार तक पहुँचती है। उनके अनुसार इसे जानना अपनी स्थिति और आगे की दिशा को जाँचने, तथा परिवार और आसपास के लोगों की देखभाल करने में भी सहायक हो सकता है।

वे कहते हैं कि किसी व्यक्ति का यीशु पर विश्वास करके उद्धार पाना केवल एक साधारण परिवर्तन नहीं, बल्कि चमत्कार है। उनके अनुसार यह परमेश्वर का ऐसा कार्य है जिसे मनुष्य अपने बल पर पूरा नहीं कर सकता; इसमें सृष्टि से भी बड़ी सामर्थ्य और लम्बी तैयारी प्रकट होती है। वे चंगाई को भी चमत्कार मानते हुए आत्मा के उद्धार को उससे बड़ा चमत्कार कहते हैं। यह वचन सुनाने वाले की धर्मशास्त्रीय व्याख्या है।

2. उद्धार से पहले की आत्मिक दशा कैसी है? आने वाले बाइबल-पद खोजकर लिखिए

वचन सुनाने वाले विश्वास से पहले की दशा को आत्मा के मरे हुए और परमेश्वर से सम्बन्ध टूटे होने की दशा बताते हैं। वे पाप और मृत्यु के सब लोगों तक पहुँचने के बाइबिलीय वर्णन का उल्लेख करके कहते हैं कि बाहरी धार्मिक जीवन या बाइबल का ज्ञान होने पर भी यदि नया जन्म न हुआ हो तो उद्धार के प्रश्न को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यह वचन सुनाने वाले का दावा है।

वे एक ऐसे व्यक्ति का अनुभव सुनाते हैं जो एक समर्थ पादरी के परिवार में बड़ा हुआ था, पर बचपन में सभाओं में देखी बातों पर विश्वास न कर सका और कुछ समय के लिए कलीसिया छोड़ दिया था, और कहते हैं कि परिवार तथा कलीसिया का वातावरण किसी व्यक्ति के अपने विश्वास का स्थान नहीं ले सकता।

इस संदेश में वे यह भी समझाते हैं कि अविश्वासी व्यक्ति शरीर की इच्छाओं के अनुसार जी सकता है और अदृश्य दुष्ट आत्मा के प्रभाव में हो सकता है। वे एक ऐसा उदाहरण देते हैं जिसमें ग्रहण करने की प्रार्थना के समय किसी के चेहरे का रंग बदल गया और फिर उसे शान्ति मिली; इसे वे आत्मिक वास्तविकता का उदाहरण बताते हैं। यह वचन सुनाने वाले द्वारा सुनाया गया व्यक्तिगत अनुभव है; इसे सभी लोगों पर उसी रूप में लागू नहीं किया गया है।

3. एक आत्मा के उद्धार के लिए आत्मिक युद्ध की प्रार्थना करनी होगी

वचन सुनाने वाले कहते हैं कि एक आत्मा को उद्धार दिलाने और स्थिर करने के लिए पीछे कार्य करने वाली दुष्ट आत्मा को बाँधने की आत्मिक युद्ध वाली प्रार्थना आवश्यक है। यह वचन सुनाने वाले का धर्मशास्त्रीय दावा है।

वे अपने अनुभव के आधार पर कहते हैं कि प्रतिदिन एक घण्टा प्रार्थना विश्वास को बनाए रखने में, दो घण्टे प्रभाव डालने में, और तीन या चार घण्टे आत्माओं को अधिक सामर्थ्य से सुसमाचार सुनाने में सहायक रहे। यह उनका व्यक्तिगत अनुभव और प्रोत्साहन है; प्रार्थना के समय को सभी के लिए एक-सा मानदण्ड नहीं बनाया गया है।

4. पूर्वगामी अनुग्रह

वचन सुनाने वाले कहते हैं कि अविश्वासी व्यक्ति में भी परमेश्वर के स्वरूप के चिह्न, परमेश्वर के लिए लालसा, पाप के प्रति दोषबोध और आत्मिक प्यास शेष हो सकती है। वे उस अनुग्रह को, जिसमें पवित्र आत्मा अभी विश्वास न करने वाले के मन में पहले से कार्य करके उसे परमेश्वर के बारे में सोचने देते हैं, “पूर्वगामी अनुग्रह” कहते हैं। यह वचन सुनाने वाले द्वारा प्रयुक्त धर्मशास्त्रीय शब्द और उनकी व्याख्या है।

वे एक डीकन का अनुभव बताते हैं: सुसमाचार सुनाते समय जिस व्यक्ति ने आरम्भ में इन्कार किया था, उसने किसी समय पूछा कि क्या वह विश्वास कर सकता है। संदेश में इसे ऐसे व्यक्ति को पहचानने के रूप में समझाया गया है जिसमें परमेश्वर पहले से कार्य कर रहे हैं। यह वचन सुनाने वाले द्वारा सुनाया गया व्यक्तिगत अनुभव है; इसे हर सुसमाचार-कार्य की एक जैसी प्रक्रिया का सामान्य प्रमाण नहीं माना गया है।

5. एक आत्मा उद्धार कैसे पाती है?

वचन सुनाने वाले कहते हैं कि एक आत्मा के उद्धार में तीन तत्व एक साथ होते हैं। पहला, उद्धार तक पहुँचाने वाला विश्वास पवित्र आत्मा ही देते हैं। वे ऐसे व्यक्ति का उदाहरण देते हैं जिसने कलीसिया के जीवन या धार्मिक उत्साह में बहुत समय बिताने के बाद भी, किसी क्षण व्यक्तिगत रूप से यीशु को ग्रहण करके बदल जाने की गवाही दी; वचन सुनाने वाले इसे पवित्र आत्मा का कार्य मानते हैं। यह वचन सुनाने वाले की व्याख्या है।

दूसरा, वचन सुनाने वाले के अनुसार, पवित्र आत्मा के साथ काम करने वाले सुसमाचार प्रचारक या सेवक को प्रार्थना करनी होती है। इस संदेश में किसी के उद्धार के लिए मध्यस्थता करने वाले व्यक्ति, प्रार्थना, प्रेम से की गई सेवा और सुसमाचार के बीज बोने—इन सबको आवश्यक बताया गया है। प्रेम से की गई सेवा की तुलना उस कठोर हृदय-भूमि को कोमल करने से की गई है जिसमें सुसमाचार का वचन जड़ पकड़ सके।

वे कहते हैं कि मनुष्य जीवित और सदा रहने वाले परमेश्वर के वचन से नया जन्म पाता है और 1 पतरस 1:23 का उल्लेख करते हैं। तीसरा तत्व, उनके अनुसार, उस व्यक्ति की प्रतिक्रिया है जो सुसमाचार सुनकर अपना मन खोलता और यीशु को ग्रहण करता है। विश्वास करने का निर्णय करने के बाद भी स्पष्ट विश्वास तुरन्त न उत्पन्न हो, फिर भी किसी समय पवित्र आत्मा विश्वास देते हैं, ऐसा वे रोमियों 1:17 का उल्लेख करके कहते हैं। इन तीन तत्वों के साथ होने पर उद्धार का चमत्कार होता है—यह वचन सुनाने वाले का दावा है।

6. एक आत्मा उद्धार पाती है तो क्या होता है?

वचन सुनाने वाले कहते हैं कि उद्धार पाते समय तीन बड़ी बातें होती हैं। पहली, पश्चाताप के साथ यीशु मसीह के लहू से सब पाप धोए जाते हैं। वे एक स्वर्गलोक की गवाही-पुस्तक में वर्णित दृश्य उदाहरण के रूप में देते हैं, जिसमें एक व्यक्ति के पश्चाताप करने पर स्वर्गदूत यीशु के लहू से दर्ज पापों की पुस्तक को पन्ना-दर-पन्ना धो डालते हैं, और उससे पाप-क्षमा का आनन्द समझाते हैं।

दूसरी बात, वे कहते हैं कि यीशु का अनन्त जीवन आत्मा के भीतर प्रवेश करता है। संदेश में इसे उस जीवन के रूप में बताया गया है जिससे मरी हुई आत्मा जीवित होती, परमेश्वर का अनुभव करती, प्रार्थना और पवित्र आत्मा के कार्य का उत्तर देती और अनन्त आशा पाती है। यह वचन सुनाने वाले का धर्मशास्त्रीय दावा है।

तीसरी बात, वचन सुनाने वाले के अनुसार, व्यक्ति की पहचान बदल जाती है—शैतान की सन्तान से परमेश्वर की सन्तान, और संसार के नागरिक से स्वर्ग के नागरिक। वे प्रोत्साहित करते हैं कि जब उद्धार पाया हुआ व्यक्ति दूसरी आत्माओं की सेवा और उन्हें स्थिर करने के काम में सहभागी होता है, तब परमेश्वर के साधन उस पर उँडेले जाते हैं। यह वचन सुनाने वाले का प्रोत्साहन और धर्मशास्त्रीय दावा है।

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