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यीशु उद्धारकर्ता हैं: शक्तिशाली प्रमाण — सुनना और समझना

ऑडियो के बारे में: इस संदेश की ऑडियो रिकॉर्डिंग कोरियाई भाषा में है। नीचे की सामग्री हिन्दी में है, पर प्ले दबाने पर आपको कोरियाई भाषा सुनाई देगी।

1. परमेश्वर ने भविष्यवाणी के द्वारा यीशु की गवाही दी

संदेश आरम्भ में सुसमाचार को अचानक बनी कहानी नहीं, बल्कि परमेश्वर द्वारा बहुत समय में भविष्यद्वक्ताओं से पुत्र के विषय में कही और पूरी की बात बताता है। वचन सुनाने वाले कहते हैं कि किसी से बिना आधार के विश्वास करने को नहीं कहा जाता; विश्वास प्रमाण और गवाही पर टिका होता है। वे इसकी तुलना अदालत में किसी तथ्य का निर्णय करते समय प्रमाण और गवाही की विश्वसनीयता जाँचने से करते हैं। यह विश्वास के आधार के विषय में संदेश द्वारा दी गई व्याख्या है।

कुल, जन्मस्थान और बढ़ने के क्षेत्र की व्याख्या

संदेश कहता है कि पुराने नियम की अनेक भविष्यवाणियाँ उद्धारकर्ता के कुल, जन्मस्थान और उस क्षेत्र की ओर संकेत करती हैं जहाँ वे बढ़ेंगे। यशायाह और मीका का उल्लेख करके यहूदा और दाऊद का वंश, बैतलहम में जन्म और नासरत में बढ़ने का क्रम प्रस्तुत किया जाता है। वचन सुनाने वाले कहते हैं कि अलग-अलग काल में लिखी भविष्यवाणियाँ एक ही व्यक्ति में एक साथ पूरी होती हैं।

वचन सुनाने वाले यशायाह 11 में आए "एक अंकुर" को इंगित करने वाली अभिव्यक्ति को नासरत के नाम से जोड़कर समझाते हैं, और यीशु के बैतलहम में जन्म तथा नासरत में बढ़ने के क्रम को भविष्यवाणी की पूर्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

रहस्यमय जन्म की संदेश-व्याख्या

संदेश कहता है कि उद्धारकर्ता दाऊद के वंश से आएँगे और फिर भी कुँवारी से जन्मेंगे। वचन सुनाने वाले इसे उस तर्क से जोड़ते हैं कि मानव के पाप को उठाने के लिए उनका मनुष्य और साथ ही परमेश्वर होना आवश्यक है। यह संदेश में प्रस्तुत धर्मशास्त्रीय व्याख्या है।

संदेश कहता है कि उस समय की संस्कृति में मरियम और यूसुफ की मंगनी कानूनी सम्बन्ध थी और विवाह से पहले तैयारी का समय होता था। यूसुफ के वंश और पवित्र आत्मा से गर्भधारण की बात के द्वारा वचन सुनाने वाले कहते हैं कि जो भविष्यवाणियाँ एक साथ पूरी होना कठिन लगती हैं, वे पूरी हुईं।

दुःख, मृत्यु और पुनरुत्थान की भविष्यवाणी

संदेश यशायाह 53 को यीशु के दुःख, मृत्यु और पुनरुत्थान का पूर्वकथन बताता है। वचन सुनाने वाले समझाते हैं कि यह पाठ यीशु के जन्म से लगभग 600 वर्ष पहले लिखा गया था, और यह यीशु के अरिमथिया के यूसुफ की कब्र में रखे जाने तथा पुनरुत्थान तक की भविष्यवाणी करता है।

वचन सुनाने वाले कहते हैं कि किसी गणितज्ञ और भौतिकविद ने पुराने नियम की आठ भविष्यवाणियों के एक साथ पूरे होने की सम्भावना की गणना 10 की 17वीं घात में से 1 के रूप में की थी, और इसे भविष्यवाणियों की पूर्ति को संयोग मानना कठिन बनाने वाला तर्क बताते हैं।

संदेश यीशु के क्रूस पर कहे अन्तिम वचन को भजन की भविष्यवाणी पूरी होने वाला दृश्य और उसके बाद के वचन को सारी भविष्यवाणियों के पूरा होने के अर्थ में समझाता है। यह संदेश की व्याख्या है। वचन सुनाने वाले यीशु की मृत्यु, तीसरे दिन का पुनरुत्थान और संसार में सुसमाचार के फैलने को एक ही गवाही के रूप में प्रस्तुत करते हैं, और यीशु को परमेश्वर के भेजे हुए मसीह तथा उद्धारकर्ता के रूप में घोषित करते हैं।

2. यीशु की रहस्यमय पहचान

संदेश रोमियों 1:2 के बाद रोमियों 1 के अगले पदों का उल्लेख करके यीशु की पहचान को दो दिशाओं से समझाता है। देह की वंशावली के अनुसार वे दाऊद के वंश से आए मनुष्य हैं, और पुनरुत्थान के द्वारा परमेश्वर के पुत्र होने की घोषणा हुई। वचन सुनाने वाले कहते हैं कि यीशु के उद्धारकर्ता होने के लिए ये दोनों पहचानें आवश्यक हैं। यह संदेश का धर्मशास्त्रीय दावा है।

पुनरुत्थान से घोषित परमेश्वर का पुत्र

संदेश समझाता है कि यीशु को मनुष्य होना था ताकि वे मनुष्य के पाप का भार उठा सकें, और साथ ही परमेश्वर का पुत्र होना था ताकि निष्पाप होकर उद्धार पूरा कर सकें। यह तर्क प्रकाशितवाक्य 1:18 से जोड़ा जाता है और यीशु को मृत्यु और मृत्यु की शक्ति पर विजय पाने वाला घोषित किया जाता है। यह संदेश की धर्मशास्त्रीय व्याख्या है।

वचन सुनाने वाले यहोवा के साक्षियों और इस्लाम का उदाहरण देते हुए समझाते हैं कि वे यीशु को मनुष्य या उत्कृष्ट भविष्यद्वक्ता मानते हैं, पर परमेश्वर का पुत्र स्वीकार नहीं करते; वे इसकी तुलना यीशु को परमेश्वर का पुत्र मानने वाले संदेश के दावे से करते हैं।

यीशु को देखकर भरोसा करने वाला विश्वास

संदेश विश्वास का केन्द्र यीशु की पहचान जानना, उनकी ओर देखना और भरोसा करना बताता है। इब्रानियों 12:1 का उल्लेख करते हुए फूलों और पौधों के प्रकाश की ओर बढ़ने की उपमा से यीशु की ओर उन्मुख विश्वास समझाया जाता है। वचन सुनाने वाले प्रोत्साहित करते हैं कि यीशु को अधिक गहराई से जाना जाए, उन्हें हृदय से ग्रहण किया जाए और हर बात में उन पर भरोसा किया जाए।

संदेश कहता है कि यीशु में पाप, असफलता, परिवार और जीवन की गहरी समस्याओं में सहायता देने वाली उद्धार की सामर्थ्य और जीवन है। वह सुसमाचार सुनते समय मन के खुलने और विश्वास के उत्पन्न होने को परमेश्वर के प्रेम का प्रमाण समझाता है। यह संदेश के धर्मशास्त्रीय दावे और प्रोत्साहन हैं।

वचन सुनाने वाले कहते हैं कि बीमारी, आर्थिक कठिनाई या प्रतिकूल मानी जाने वाली जन्म-स्थिति हो, फिर भी यदि व्यक्ति सुसमाचार पर विश्वास करके परमेश्वर की सन्तान हुआ है तो उसने सबसे बड़ी आशीष पाई है। यह उनका सेवकीय प्रोत्साहन है; यह नोट जीवन की हर कठिनाई या अनुभव को सबके लिए एक ही निष्कर्ष में नहीं बदलता। संदेश इस आशीष के वचन के साथ समाप्त होता है कि सुसमाचार पर विश्वास करने वाला परमेश्वर से प्रेम करे और सुसमाचार सुनाते हुए जिए।

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