यीशु का क्रूस और पुनरुत्थान — सुनना और समझना
ऑडियो के बारे में: इस संदेश की ऑडियो रिकॉर्डिंग कोरियाई भाषा में है। नीचे की सामग्री हिन्दी में है, पर प्ले दबाने पर आपको कोरियाई भाषा सुनाई देगी।
1. जीवित यीशु को व्यक्तिगत रूप से जानने वाला विश्वास
संदेश आरम्भ में समझाता है कि बहुत समय से कलीसियाई जीवन से परिचित होना और जीवित यीशु को व्यक्तिगत रूप से जानना तथा उन पर भरोसा करना एक बात नहीं है। केवल यीशु के विषय में ज्ञान जीवन को नहीं बदलता; सच्चा विश्वास उस सम्बन्ध में दिखाई देता है जो प्रभु के वचन को पहचानता और उनके पीछे चलता है। संदेश इसे यूहन्ना 10:27 से जोड़ता है।
वचन सुनाने वाले कठिनाई में प्रकट विश्वास, उद्धार के निश्चय, और प्रार्थना तथा वचन के द्वारा प्रभु पर निर्भर रहने के अनुभव की बात करते हैं। इसे वचन सुनाने वाले के पासबानी प्रोत्साहन और व्यक्तिगत अनुभव के रूप में लिखा गया है। ये नोट्स यह दावा नहीं करते कि प्रत्येक व्यक्ति का अनुभव या परिणाम ऐसा ही होना चाहिए।
संदेश बल देता है कि सच्चा विश्वास यीशु कौन हैं और उन्होंने क्या किया, इसे स्पष्ट रूप से जानने से आरम्भ होता है। पहले यीशु को परमेश्वर द्वारा प्रतिज्ञा किए और भेजे गए उद्धारकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
2. यीशु पूर्ण परमेश्वर और पूर्ण मनुष्य हैं
भजन 40:7 का उल्लेख करके संदेश समझाता है कि यीशु मसीह पुराने नियम की प्रतिज्ञाएँ पूरी करने आए। भविष्यवाणियों की संख्या और तिथियों का विवरण केवल संदेश के प्रवाह को समझने भर के लिए रखा गया है; ये नोट्स उन्हें स्वतंत्र रूप से सत्यापित आँकड़े या ऐतिहासिक तथ्य नहीं बताते।
यीशु के चमत्कार चिह्न हैं
संदेश पानी को दाखरस बनाने और यीशु के अन्य चमत्कारों की चर्चा करता है। वह बताता है कि पवित्रशास्त्र इन चमत्कारों को यीशु की पहचान की ओर संकेत करने वाले चिह्न कहता है। यूहन्ना 2:11 के द्वारा बल इस पर है कि केन्द्र आश्चर्यजनक घटना नहीं, बल्कि परमेश्वर के पुत्र यीशु हैं।
उन्हें परमेश्वर और मनुष्य दोनों क्यों होना था?
फिलिप्पियों 2:6-8 के अनुसार संदेश बताता है कि परमेश्वर के स्वरूप में होते हुए यीशु ने स्वयं को दीन किया, मनुष्य का रूप लिया और क्रूस की मृत्यु तक आज्ञाकारी रहे।वचन सुनाने वाले कहते हैं कि मानवजाति के स्थान पर मरने के लिए यीशु को मनुष्य और मनुष्य का पाप उठाने के लिए निष्पाप परमेश्वर का पुत्र होना था। संदेश का मुख्य दावा है कि परमेश्वर के मनुष्य बनने और स्वयं को देने में उनकी बुद्धि, प्रेम और आत्म-बलिदान एक साथ प्रकट होते हैं।
संदेश यशायाह 53:4-6 को इस शिक्षा से जोड़ता है कि यीशु ने हमारे अपराध और पाप उठाए। इसे संदेश में दी गई धर्मवैज्ञानिक व्याख्या के रूप में दर्ज किया गया है।
3. यीशु का सबसे महत्वपूर्ण कार्य
यीशु के अच्छे कार्यों और शिक्षा का सम्मान करते हुए भी संदेश कहता है कि उन्हें केवल महान नैतिक शिक्षक मानना उनमें विश्वास के केन्द्र तक नहीं पहुँचता। यीशु का सबसे महत्वपूर्ण कार्य क्रूस और पुनरुत्थान था; विश्वास इन दोनों घटनाओं को अपने उद्धार से जोड़कर उन पर निर्भर होता है।
क्रूस
संदेश बताता है कि क्रूस पर चढ़ाना रोमी मृत्युदण्ड की विधि थी और यीशु ने बहुत पीड़ा सही। प्रतिलेख में आए विस्तृत चिकित्सकीय आँकड़े और शारीरिक वर्णन स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हैं, इसलिए ये नोट्स उन्हें दोहराते नहीं हैं। संदेश का केन्द्र यह है कि यीशु ने हमारा पाप उठाने के लिए स्वयं को दिया।
2 कुरिन्थियों 5:19-21
वचन सुनाने वाले समझाते हैं कि परमेश्वर ने पाप को अनदेखा नहीं किया; मसीह में उन्होंने पाप का निवारण किया और हमें अपने साथ मिलाने के लिए पहले हाथ बढ़ाया। संदेश हमारे पाप को मसीह पर और मसीह की धार्मिकता को हम पर रखे जाने को परमेश्वर तक मार्ग खुलने का धर्मवैज्ञानिक आधार बताता है।
वचन सुनाने वाले एक व्यक्तिगत अनुभव बताते हैं जिसमें क्रूस का दृश्य देखते समय उन्होंने अपने छोटे बच्चे के विषय में सोचा। वे अपने प्रिय बच्चे को न दे सकने की स्थिति की तुलना इस सुसमाचार से करते हैं कि परमेश्वर ने पापियों के लिए अपना पुत्र दे दिया, और याद करते हैं कि परमेश्वर का प्रेम परिचित ज्ञान से हृदय को छूने वाली सच्चाई बन गया। ये नोट्स व्यक्तिगत नाम और स्थान छोड़ देते हैं तथा इस अनुभव को ऐसा मानक नहीं बताते जिसे हर विश्वासी को दोहराना हो।
संदेश बताता है कि क्रूस की ओर देखने का अर्थ अपने पाप को स्वीकारना, मन फिराना और अपनी धार्मिकता के बदले यीशु के अनुग्रह पर निर्भर होना है। फिर प्रोत्साहन दिया जाता है कि असफलता और निराशा में भी क्रूस वह स्थान बना रहता है जहाँ हम आशा से लौटते हैं।
पुनरुत्थान
1 कुरिन्थियों 15:20
संदेश बताता है कि यदि यीशु की मृत्यु अन्त होती, तो वे मृत्यु पर जय पाकर मानवजाति को नहीं बचा सकते थे। उनका पुनरुत्थान केवल एक व्यक्ति का फिर जीवित होना नहीं है; यह यीशु को पाप, मृत्यु और शैतान पर विजेता प्रकट करता है।
वचन सुनाने वाले घोषणा करते हैं कि जी उठे यीशु अतीत के व्यक्ति या धार्मिक पुस्तक की शिक्षा तक सीमित नहीं हैं। वे जीवित हैं और विश्वास से उनके पास आने वालों को बचाते हैं। अपनी शंकाओं और विश्वास के अनुभव को याद कर वचन सुनाने वाले यीशु पर अपने जीवित उद्धारकर्ता के रूप में निर्भर होने का अंगीकार करते हैं। इसे उनकी व्यक्तिगत गवाही और विश्वास के अंगीकार के रूप में दर्ज किया गया है।
अन्त में संदेश अपनी शिक्षा को यूहन्ना 11:25-26 से जोड़ता और आपको आज अपने जीवन में जी उठे यीशु पर भरोसा करके अन्त तक उनके पीछे चलने को प्रोत्साहित करता है।